ज्योतिष

ज्‍योतिष व तकदीर -

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ईश्‍वर या अन्‍य किसी बाह्य शक्ति  में  विश्‍वास करने वाले ज्‍यादातर लोग तकदीर  नाम की चीज को भी मानते है। उनके अनुसार वे जो कुछ करते है –  उनके साथ जो कुछ होता है  - व‍ह सब उनके ईश्‍वर ने पहले से ही लिख दिया है। उनके  इसी विश्‍वास ने लाखों लोगों को रोजगार दिया हुआ है। इन लोगों को ज्योतिषी कहते है  – कोई हाथ की रेखायें देखकर भविष्‍य बताता है   - तो कोई माथे की लकीरें देखकर । कोई तो चेहरा पढ़कर ही बता देता है कि आगे क्‍या होने वाला है। कुछ जन्‍म की तारीख व समय जानकर भी पूरा भविष्‍य निकाल देते है। आजकल तो यह धन्‍धा भी हाई टैक हो गया है। पलक छपकते ही कम्‍प्‍यूटर जी पूरा भविष्‍य आपके सामने रख देते है।

काफी लोग यह भी  मानते हैं कि कुछ ग्रह उन  पर प्रभाव डाल सकते है।  उस प्रभाव को कम करने  के लिये इतने बड़े ग्रह का  मुकाबला वे एक छोटे से  पत्‍थर से करते है जिसे  अंगूठी में पहनकर बड़े  गौरवान्वित महसूस  करते है। हालांकि कुछ एक से ज्‍यादा पत्‍थर भी पहनकर रखते है- पता नहीं कब कौन सा  पत्‍थर काम कर जायें। देखा जाये तो इन पत्‍थरों की कोई कीमत नहीं होनी चाहिये  –  लेकिन लोग इन्‍हें हज़ारों रूपये में खरीदते है। कोई आम पत्‍थर थोड़े ही हैं ये जो इतने बड़े  – बड़े ग्रहों से मुकाबले करने की क्षमता रखते है।

वाह रे मानव ! अपने आप को सभ्‍य (Civilized) कहता है। आधुनिक मानता है। बहुत  से तो अपने आपको पढ़ा लिखा भी मानते है – सोच ऐसी कि जैसे अभी भी तू प्राचीन  सभ्‍यता का प्राणी है। यह भी मानता है कि तू विज्ञान के युग में जी रहा है, लेकिन तेरी  सोच अभी भी मूर्खता पूर्ण है। विज्ञान की दी गई सुविधाओं तो भोग रहा है। लेकिन विज्ञान  ने जो सोच दी है उसे गलत मानता है। विज्ञान कहता है ज्‍योतिष बकवास है  – कोई तकदीर नाम की चीज नहीं होती है – इस पर तू कहता है कि विज्ञान बकवास है। तेरे बीमार मस्तिष्‍क का इससे बड़ा प्रमाण क्‍या हो सकता है।

21वीं सदी में तों यह धन्‍धा और भी ज्‍यादा विकसित हो रहा है। एक  मानव संसाधन मंत्रि हुये है- मुरली मनोहर जोशी- उन्होने तो इस विघा को विश्‍वविधालयों  के पाठ्यक्रम में सम्मिलित कराने की भी पुरजोर कोशिश की  (देवताओं की पार्टी के जो ठहरे)  लेकिन भला हो कुछ रैशनेलिस्‍ट विचारधारा के लोगों का व वैज्ञानिक बिरादरी के लोगों का जिन्‍होनें अपने प्रयासों से मुरली मनोहर जोशी की इस चाल को कामयाब नहीं होने दिया वरना निश्चित ही हम प्रगति की इस दौड़ में कई कदम पीछे चले जाते। देवताओं की पार्टी को जरूर वोटों में कुछ इजाफा हो जाता क्‍योंकि इस पार्टी के एजेण्‍डा में देश के विकास का कोई स्‍थान नहीं है। इनका एक मात्र एजेण्‍डा है- हिन्‍दुओं में अंधविश्‍वास को अधिक से अधिक बढ़ाना।

वैज्ञानिक बिरादरी ज्‍योतिष  के अंधविश्‍वास को लेकर पहले से ही बहुत दुःखी रही है। सन् 1975 में दुनिया के 186 वैज्ञानिकों ने, जिनमें 19 नोबेल पुरस्‍कार विजेता थे, ज्‍योतिष   का खुला विरोध किया था — क्योंकि कुछ लोग ‘ज्‍योतिष  को विज्ञान’ मानने का दावा करते रहें है।

ज्‍योतिष में किसी व्‍यक्ति के जीवन पर ग्रहो के प्रभाव का दावा किया जाता है। यहां तक कि राष्ट्रों , राजनीतिक पार्टियों आदि पर भी ग्रहो के प्रभाव का दावा किया गया है।  लगभग 1000 वर्ष पूर्व जब ज्‍योतिष की शुरूआत हुई तब पृथ्वी के अलावा केवल पाँच ग्रहों का ही पता था।  मंगल, बुध, शुक्र, वृहस्पति व शनि  बाकी तीन ग्रह – यूरेनस, नेपच्‍यून व प्‍लेटों की खोज बाद में क्रमश: सन् 1781, 1864 व 1930 में हुई। आज भी बहुत से ज्‍योतिषी यूरेनस, नेपच्‍यून  व प्‍लेटों का जिक्र नहीं करते । ज्‍योतिष में कुछ ऐसे ग्रहों का भी जिक्र है जो वास्‍तव में हैं ही नहीं — जैसे ‘राहु’, ‘केतू’ आदि । ग्रहों के अलावा भी ब्रहमाण्‍ड में लाखो-करोडो तारे है जिनके प्रभाव का कोई जिक्र नहीं करते हे। यदि कुछ ग्रह प्रभाव  डालते है तो बाकी ग्रह व अन्‍य तारे क्‍यों नहीं। इसका कोई जवाब नहीं । यह कैसे मुमकिन है कि लाखो मील दूर कोई ग्रह करोडो की भीड़ में किसी एक मानव को पहचान लेता है तथा उस पर प्रभाव डालता है। इसका कोई तार्किक (Logical) जवाब नहीं है।

ज्‍योतिष कोई विज्ञान नहीं है। इसे विज्ञान कहने वाले शायद विज्ञान का मतलब नहीं जानते। विज्ञान का कोई भी सिद्धांत किसी भी जगह सिद्ध किया जाये- नतीजा एक जैसा ही आयेगा। ज्‍योतिष  में ऐसा नहीं है। यदि 10 विभिन्‍न ज्‍योतिषियों से होरोस्‍कोप (Horoscope) बनवाया जाये  तो 10 अलग- अलग नतीजे सामने आयेगें। यदि 10 विभिन्‍न समाचार पत्रों में छपी राशि फल  पर गौर करे तो सभी राशि फल अलग-अलग पायेगें।

कुल मिलाकर निष्‍कर्ष यह हुआ कि ज्‍योतिष कोई विज्ञान नहीं है। यदि किसी के मस्तिष्‍क में तार्किक (Logically)  सोचने की थोड़ी भी क्षमता है तो वह ज्‍योतिष , तकदीर जैसे अंधविश्‍वास को एक झटके में नकार देगा और यदि मस्तिष्‍क बीमार है – तार्किक (Logically) सोचने की क्षमता है नहीं या तो खत्‍म हो गई  — तो ऐसे एक नहीं,  अनेकों अंधविश्‍वास इस बीमार मस्तिष्‍क में अपना घर बना लेगें। स्‍वामी विवेकानन्‍द की ऐसे लोगों के लिये सलाह है-

ज्‍योतिष या अन्‍य कोई अंधविश्‍वास कमजोर दिमाग के लक्षण है। जब भी ऐसा लगे कि ये चीज़ें दिमाग में जगह बना रहीं है तो तुरन्‍त डॉक्‍टर को दिखालें, अच्‍छा भोजन ले तथा थोड़ा आराम करें

हम 21वीं सदी में है। विज्ञान अपनी चरम सीमा पर है। किसी देश की प्रगति में वहाँ के लोगों की सोच की बहुत बड़ी भूमिका होती है। हम भी देश की प्र‍गति में बहुत बड़ी भूमिका निभा सकते है- अपनी सोच को सही कर के । ज्‍यादातर विकसित देशों में यह देखा गया है कि वहां के काफी लोगों के सोचने का तरीका रेशनल (Rational) है – अंधविश्‍वासो की कमी है। वे चीजों को वैज्ञानिक नज़रिये से देखते है। कुछ आकंडो पर नजर डाली जायें—सयुंक्‍त राज्‍य अमेरिका में रेशनल  सोच वाले लोगों की संख्‍या 14.1% है , आस्‍ट्रेलिया में  15.5%, रूस में 32%, फ्रांस में 54% । भारत  में रेशनल  सोच वाले लोगों की संख्‍या 1% से भी कम है। रेशनल व वैज्ञानिक नज़रिये से मतलब है कि किसी भी चीज का विश्‍वास बंद दिमाग से नहीं किया जाये। दिमाग में तार्किक (Logical) सोच रखें- फिर यदि लगता है कि उसके होने का कोई आधार है तो मानें अन्‍यथा नहीं । हमारा संविधान भी हमसे यही अपेक्षा करता है। संविधान के अनुच्‍छेद 51 () नागरिकों के मूल कर्तव्यों को बताया गया है जिनमें एक मूल कर्तव्य है – वैज्ञानिक सोच को विकसित (Develop) करना।

इसलिये आओ अपने सोचने के ढंग को बदले। अंधविश्‍वासो के अंधेरे से बाहर निकल कर ‘उजाले’ में जीयें। ‘ज्‍योतिष’  या ‘तकदीर’ रूपी अंधविश्‍वास को खत्‍म कर दें। माना कि इससे लाखों लोग बेरोजगार हो जायेगें, लेकिन यह भी देश हित में होगा क्योंकि उनके इस रोजगार से देश को नुकसान ही नुकसान होना है।

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