धर्म क्या है?
क्या धर्म जरूरी है ? -
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शुरू में कोई धर्म नहीं था। सभी इंसान - बस इंसान थे। ज्यों-ज्यों सभ्यता का विकास होता गया, इंसानियत कम होती गई - स्वार्थ बढ़ता गया । कुछ स्वार्थी लोगों ने अपने फ़ायदे के लिये ईश्वर (चाहे उसका नाम कोई भी हो) का डर लोगों के मन में पैदा किया। तरह-तरह के अंधविश्वास लोगों के मन में पैदा किये गये। धीरे – धीरे ईश्वर के प्रति आस्था के विभिन्न समुह बन गये। हर समुह के उन स्वार्थी लोगों ने उस समुह का अपना अलग ईश्वर बना दिया तथा लोगों के नैतिक आचरण के लिए उस ईश्वर की तरफ से नियम बना दिये गये जो उस समुह के लोगों को मानने पड़ते । कुछ बहुत ही चालाक किस्म के स्वार्थी लोग उस तथाकथित ईश्वर के एजेन्ट बन गये । अलग – अलग ईश्वर के प्रति आस्था के रूप में जन्में इन विभिन्न समुहों ने ही आगे चलकर विभिन्न धर्मों के नाम से अपनी अलग पहचान बना ली ।
समय- समय पर कुछ समाज सुधारक पैदा हुये जिन्होनें समाज में व्याप्त बुराइयों को दूर करने के लिए काम किया तथा लोगों को सही रास्ता दिखाने की कोशिश की । गौतम बुद्व , महावीर, ईसा मसीह, मोहम्मद, नानक आदि ऐसे ही समाज सुधारक थे। इन्हें किसी ईश्वर ने नहीं भेजा था । ये भी आम लोगों की तरह ही थे – इनमें और आम लोगों में बस यही फर्क था कि इन्होंने अपना पूरा जीवन समाज सुधार में लगा दिया। इनके जाने के बाद इनके कुछ स्वार्थी अनुयाइयों ने अपनी अलग पहचान व अपने स्वार्थ के लिये इन्हें ईश्वर से जोड़ दिया तथा इनके नाम पर नये धर्म पैदा कर दिये । धीरे – धीरे इन नये धर्मों में भी स्वार्थी लोगों ने अपने स्वार्थ के लिये तरह- तरह के पाखंड व अंधविश्वास पैदा कर दिये। इस तरह दुनियां में जो भी धर्म मानव ने बनाये हैं उन सब का आधार ईश्वर है -चाहे उसका नाम कोई भी हो । हां बोध धर्म में शुरू में ईश्वर का कोई स्थान नहीं था लेकिन बाद में इसके भी दो सम्प्रदाय बन गये- हीनयान व महायान। महायान बुद्व को ईश्वर का बेटा मानने लग गये और पूजा शुरू कर दी। शुरू में जैन धर्म में भी ईश्वर को नहीं माना जाता था लेकिन बाद में इसमें भी ढेर सारे अंधविश्वास और पाखंड शामिल हो गये । कोई भी धर्म ऐसा नहीं है जिसमें अंधविश्वास और पाखंड न हो । हिन्दू धर्म में तो अंधविश्वास और पाखंड ही पाखंड हैं।
तो धर्म और ईश्वर का गहरा सम्बंध है। और जैसा मैं पहले बता चुका हूं कि ईश्वर, खुदा, गॉड जैसी कोई चीज़ नहीं है। चोंकिए मत – क्योंकि सच यही है। चूंकि जब मैं इस सच को जानता हूं कि ईश्वर, खुदा, गॉड जैसी कोई चीज़ नहीं है — तो फिर किसी भी धर्म को मैं क्यों मानूं – मैं नहीं मानता – किसी धर्म को नहीं मानता । हां एक धर्म है जिसे मेरे जैसे तार्किक (रेशनल) व वैज्ञानिक सोच रखने वाले मानते हैं – ‘ मानवता ’ का धर्म ।
ऐसा मैं अकेला नहीं हूं - मेरे जैसे लाखों – करोड़ों लोग हैं जो ‘ मानवता ’ के धर्म को मानते हैं – इस सच को जानते हैं कि ईश्वर, खुदा, गॉड जैसी कोई चीज़ नहीं है । इस तरह के लोग विकसित देशों में ज्यादा है। मेरे अनुसार ‘ मानवता ’ के धर्म के अलावा अन्य कोई भी धर्म अच्छी चीज़ें नहीं सिखाता है। ईश्वर के प्रति आस्था के विभिन्न रूपों से उपजे सभी धर्म जीवन के प्रति नकारात्मक होते हैं । धर्म ज्ञानी बना सकता है लेकिन बुद्वीमान नहीं। क्योंकि तर्क के बिना मनुष्य बुद्विमान नहीं बन सकता। प्राय: जो भी महान् बुद्विमान व्यक्ति हुये है उनका सम्बंध धर्म से बहुत कम रहा है या खत्म हो गया। मैं नहीं मानता कि जिन्दगी में सही आचरण के लिए इस तरह के किसी धर्म की आवश्यकता है। आज के समय में यह पंक्ति एकदम झूठी लगती है ….. ‘मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना ’ – बल्कि मजहब ही आपस में बैर रखना सीखा रहा है।
ईश्वर के प्रति आस्था के विभिन्न रूपों से उपजे धर्मो ने दुनिया में फायदा कम और नुकसान ज़्यादा किया है। तार्किक (रेशनल) व वैज्ञानिक सोच का कोई नुकसान ध्यान में नहीं आ रहा, पर इस आस्तिकता से हज़ारों नुकसान हुए हैं । कुछ पर नज़र डाली जाए –
- संसार में जितने फसाद चल रहे हैं, आज और हज़ारों सालों से, उनकी जड़ यही है — ईश्वर, खुदा, गॉड । ईराक में किसी सुन्नी ने एक शिया मस्जिद में ख़ुद को उडा दिया और साथ में ७० और लोगों के परखचे उड़ा दिए — यह अमरीका के खिलाफ लड़ाई तो नहीं थी। रोज़ ऐसे किस्से सुनने को मिलते हैं। इतिहास का कोई पन्ना और भूगोल का कोई भाग इस बीमारी से बचा नहीं है।
१७वीं शताब्दी के फ्राँस के एक भौतिक विज्ञानी पास्कल का कथन बिलकुल सही प्रतीत होता है –
Men never do evil so completely and cheerfully as when they do it from a religious conviction.
जब आदमी बुरा काम यह सोच कर करता है कि यह धर्म का काम है, खुदा का काम है, तो वह खुशी से भी करता है, और बिना किसी अपराध बोध के भी। चाहे वह वर्ल्ड ट्रेड सेंटर में जहाज़ घुसाना हो या ग्राहम स्टेन्ज़ का कत्ल। कोई चोर-डाकू जब बैंक लूट रहा हो तो उसे कम से कम यह तो ख्याल होता है कि मैं ग़लत काम कर रहा हूँ। ९-११ की एक फ्लाइट में किस प्रकार आतंकवादी अल्लाह का नाम ले ले कर अपना काम पूरा कर रहे थे। यह मत कहिए कि मज़हब यह सब नहीं सिखाता। मज़हब यही सब सिखाता है । धर्म के नाम पर कितने बेकसूर मुस्लिम हिन्दुओं द्वारा मोत के घाट उतार दिये जाते हैं तथा कितने बेकसूर हिन्दू मुस्लिमों द्वारा । इस्लाम व इसाई धर्म की ळडाई तो दुनिया भर में देख ही रहे हैं ।
- धार्मिक पुस्तक यदि एक ग़लत बात सिखाए तो मेरे हिसाब से वह बेकार है, पर यहाँ तो धार्मिक पुस्तकें इतनी उल्टी सीधी बातें सिखाती हैं कि समझ में नहीं आता हज़ारों साल तक करोड़ों लोग कैसे बेवक़ूफ़ बने रहते हैं। अब आप ही बताइए, हम मर्यादा पुरुषोत्तम राम की तरह धोबी के कहने पर पत्नी को त्यागें, या उन के पिता की तरह तीन पत्नियाँ रखें। सत्यमूर्ति युधिष्ठिर की तरह पत्नी समेत सब कुछ जुए में हारें, या ईश्वर शंकर की तरह अपने बेटे का ही सिर काट दें। ईसा का सन्देश फैलाने के लिए क्रुसेड करें, या मुहम्मद का पैग़ाम पहुँचाने के लिए जिहाद।
- मैं कितने ही लोगों को जानता हूँ जिन्होंने ईश्वरोपासना को अपने जीवन का उद्देश्य मानकर उन कार्यों, उन लोगों की उपेक्षा की, जिन की उन के ऊपर ज़िम्मेवारी थी। कितने ही लोग हैं जो गृहस्थ में तो रहते हैं, पर धर्म के ढ़ोंग में इतने विलीन रहते हैं, कि आसपास के मानवों की भावनाओं की अनदेखी करते हैं।
- धर्म का वास्ता दे कर कई लोग ऐसे निश्चय नहीं ले पाते जो अन्यथा नैतिक या व्यावहारिक रूप से सही हों। कुछ लोगों को रक्तदान से परहेज़ होता है, और कुछ लोगों को नसबन्दी से। मरने पर शरीर का कोई भी भाग किसी को दान दिया जा सकता है या विज्ञान के लिए प्रयोग में लाया जा सकता है। यह कोई बड़ा काम नहीं है क्योंकि जो चीज़ आपके काम की नहीं है, क्या फ़र्क पड़ता है उस के साथ क्या हो । परन्तु धार्मिक प्रवृत्ति के कारण हिन्दू चाहता है कि उसका शरीर जलाया ही जाए और अस्थियाँ गंगा के प्रदूषण के लिए प्रयोग की जाएँ। इसी तरह मुस्ळिम व इसाई चाहता है कि उसका शरीर दफनाया जाए ।
- धर्म के कारण विज्ञान की बहुत अनदेखी होती है। बेचारे गैलिलियो को कितनी यातनाएँ सहनी पड़ीं, यह कहने के लिए कि पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है। चार्लस डार्विन को तो अभी भी मज़हबियों की गालियाँ पड़ती हैं।
- धर्म के कारण लोग देश द्रोह के लिए भी उतारू हो जाते हैं। खाळीस्तान आन्दोळन इसी का एक उदाहरण है ।
- गॉड को मानने वाले ईसा मसीह के अनुयायियों ने ही अफ्रीका के लोगों को दास बनाया था । सैकड़ों वर्षों तक उन्हें पशुओं की तरह जंजीरो में बांधकर रखा जाता था। इसमें वे बड़ा गर्व महसूस करते थे। क्योंकि उनकी बाईबिल इसकी इजाजत देती है।
- ईश्वर को मानने वाले हिन्दुओं ने भी कुछ ऐसा ही मिलता – जुलता काम किया है। सदियों पहले हिन्दू धर्म के कुछ बहुत ही चालाक किस्म के लोगों ने अपने स्वार्थ के लिये जाति प्रथा की नींव डाल दी । इस प्रथा ने समाज के एक मुख्य भाग को सदियों तक उनका गुलाम बनाये रखा । कुछ लोग ‘ ईश्वर ‘ के एजेन्ट बन गये उन्होने ऐसी व्यवस्था पैदा कर दी कि उनके माध्यम से ही कोइ ईश्वर से Communicate कर सकता है । उन्होने ऐसी व्यवस्था की नींव डाल दी कि पढ़ने लिखने का अधिकार उन्होने अपने पास रख लिया। तरह- तरह के अंधविश्वास पैदा कर दिये। ताकि लोग उनके पास आते रहें – दान-दक्षिणा देते रहें और उनका बिना मेहनत का धंधा चलता रहे। उनकी आने वाली पीढि़यां भी मुफ्त का खाती रहें। मेहनत करने वालों को तो उन्होंने ‘दलित’, ‘शुद्र’ बना दिया — जिनको वे दास की तरह मानते रहे हैं। उनकी परछाई को भी अछूत मानते रहे हैं। यदि, गॉंधी जैसे लोग न होते तो उनके बनाये इन अछूतों की हालत जाने कब ठीक होती। शुरू में अंधविश्वास का जो जाल उन्होने दूसरों के लिये बुना था उसमें धीरे-धीरे उनके वंशज भी फँसते चले गये हैं। यही कारण है कि आज ऐसे लोगों की संख्या बहुत अधिक है।
खैर, इस लिस्ट का तो कोई अन्त नहीं है।
धर्म एक तरह का ज़हर है, लोगों के मन में अलगाव के बीज डालता है । कार्ल मार्क्स ने सही कहा है कि… “ धर्म अफीम का नशा है ”। लोगों को धर्म का नशा इतना चढ़ गया है कि उन्हें यह ध्यान भी नहीं रहा कि वे मानव भी हैं। इन तथाकथित धर्म के अनुयायियों में करुणा, दया, अहिंसा, प्रेम, सहिष्णुता का नाम तक नहीं है। आडम्बर, पाखण्ड, मण्ड का लबादा ओढ़कर महान आस्तिक कहलाते हैं।
अपना उल्लू सीधा करने के लिए हर जायज़-नाजायज़ बात को धर्म का कपड़ा ओढ़ा देना पंडे – पुरोहित, मोलवी, पादरी आदि का सदियों से यह कार्य रहा है । मुफ्त की खाने के लिए इन्होंने तरह तरह के दान दक्षिणा की व्याख्या कर दी जो कि इनको दिया जाना चाहिए । सबसे बड़े अधर्मी तो ये ही लोग होते हैं क्योंकि ये कर्म नहीं करते हैं ।
मंदिरों तथा पूजारियों के सम्बन्ध में जवाहर लाल नेहरू की सोच कितनी सही थी –
“ मैं चाहता हूं कि सारे मंदिरों में स्कूल खोल दूं तथा सारे पुजारियों को काम पे लगा दूं ताकि स्कूल भवन बनवाने पर होने वाला खर्च बच सके तथा पुजारी भी काम करके खायें । ”
जैसा मैने बताया हिन्दू धर्म तो पाखंडों से भरा पड़ा है। इस धर्म में सब से ज्यादा देवी देवता हैं – करोड़ों की संख्या में । सांप से लेकर नदियों तक और सूरज से लेकर अमिताभ बच्चन तक की पूजा करते हैं । फिर भी नित नए ईश्वर गड़ते रहते हैं ।
संसार में कितना धन, समय और ऊर्जा धार्मिक कामों और इमारतों पर खर्च होते हैं? यही संसाधन यदि किसी और तरीके से प्रयोग किए जाते तो संसार में कितना सकारात्मक परिवर्तन आता, इस का हिसाब लगाना कठिन है।
धर्म को मानने वाले कहते हैं कि यदि धर्म न हो तो लोगों को जीवन की राह कैसे मिलेगी, सत्य-असत्य, सुकर्म-कुकर्म का अन्तर कैसे समझ में आएगा ? यदि यह तर्क मान्य होता तो तार्किक (रेशनल) व वैज्ञानिक सोच रखने वाले सभी लोग झूठे, कुकर्मी, और अपराधी होते। बल्कि है इस का उलट। यह देखा गया है कि लगभग सब उल्टे-सीधे काम करने वाले ईश्वर में आस्था रखते हैं। क्योंकि वे जानते हैं कि बुरा काम करने पर भी यदि थोडी खुशामद की जाये तो उनका दयालु ईश्वर माफ कर देगा। रेशनल विचारधारा एक सोच-समझ कर चुनी हुई विचारधारा होती है। ‘रेशनल’ विचारधारा के लोग सच और झूठ को समझते हैं । वे इंसानियत को मानते है। ‘मानवता’ के धर्म का पालन करते है। तुम कहोगे कि ईश्वर के बिना समाज कैसे चलेगा ? समाज चलेगा — देश के कानून से और समाज के नियमों से। आज भी समाज देश के कानून और समाज के नियमों से ही चल रहा है – तुम्हारे ईश्वर के नियमों से नहीं । इस तरह ईश्वर के प्रति आस्था के विभिन्न रूपों से उपजे सभी धर्म बेकार हैं। ये सब ‘मानवता’ के लिए खतरा हैं । भलाई इसी में है कि इन धर्मों को छोड़ कर ‘मानवता’ के धर्म को अपनाया जाये । धर्म के बारे में किसी ने ठीक ही कहा है -
न पोशाकों में हूं, न कर्म-काण्डो में हूं ।
न पूजा में हूं, न अजान में हूं।
मैं तो बस मानवता मय आचरण में हूं ।
‘मानवता’ का धर्म ही ऐसा धर्म है जिसमें कोइ बुराई नहीं है । ‘मानवता’ का धर्म ही सबसे बङा धर्म है।
मुझे लगता हे कि आने वाली कुछ सदियों बाद ईश्वर रूपी धर्म का अस्तित्व खत्म हो जायेगा , क्योंकि जैसे – जैसे तार्किक /वैज्ञानिक सोच विकसित होगी - लोगों में किसी बाह्य शक्ति के प्रति अंधविश्वास स्वत: ही कम होता जायेगा - जो धीरे-धीरे खत्म हो जायेगा - और फिर धर्म के प्रति जुड़ाव भी खत्म हो जायेगा । फिर न कोई हिन्दू होगा – न मुसलमान, न ईसाई । बस एक ही धर्म होगा – ‘ मानवता का धर्म ’ ।
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