हिंदी पत्रकारिता
आज दो प्रकार के पत्रकार हैं | नामी पत्रकार जिनका राजनैतिक गलियारों में नाम और चर्चा है इनका जीवन सुखद हैं |सरकार से उन्हें जीवन की सही मूलभूत सुख सुविधाए मिली हैं समय-समय पर सरकारी अवार्डों से उन्हें सम्मानित किया जाता है, राजनीतिक दल अपने प्रवक्ता भी नियुक्त करते हैं | कईयों ने अपना स्थान केवल अपनी प्रतिभा से नहीं बनाया है उनकी अपनी सूझ बूझ और कूटनीतिक ह्थकंडों का भी स्थान है | उनकी बात अलग हैं लेकिन पत्रकारिता महंगा शौक व नशा है न जाने कितने पत्रकार कुछ कर दिखाने के जोश में अपना जीवन भी दावं पर लगा देते हैं पत्रकारों का जीवन सुरक्षित नहीं है वह खतरों से खेल कर सनसनी खेज समाचार लाते हैं या स्टिंग आपरेशन करते हैं | जब से अपराधी तत्वों का राजनीति में प्रवेश हुआ है वह अब रंगे सियार की भांति लक झक सफेद कुर्ता पहन कर अपनी चाल ढाल को बदल, सौम्यता का अवतार धर कर अपना गुणगान कराना चाहते हैं प्रिंट मीडिया में उनके चित्र और पक्ष में लेख छपें उन समाचारों को दबाया जाये जिनमें उनके कुकृत्य उजागर होते हैं|
सच कहना लिखना जोखिम भरा काम है कई पत्रकारों की हत्या भी हुई पता ही नहीं चला हत्या की सुपारी किसने दी गयी थी |सरकार और समाज को चाहिए कि पत्रकारों को सुरक्षा प्रदान करें उन्हें सच कहने से न रोकें क्योंकि यही लोग लोकतंत्र के चौथे खम्भे और जन मत के निर्माता हैं लोकतंत्र में इनका अलग महत्व और पहचान है|
किसी स्टूडेंट से पूछों आप क्या बनना चाहते हैं वह मुस्करा कर कहते हैं ‘पत्रकार’ मीडिया में जाना चाहते हैं लेकिन माता पिता नें जाने नहीं दिया समझाया अनिश्चित भविष्य है | उन्हें बेबाकी से अपनी बात कहना किसी के भी सामने माईक लगा कर प्रश्न करना मीडिया का चकाचौंध से परिपूर्ण जीवन आकर्षित करता है | सच्चाई में क्या पत्रकार सुखी हैं ?पत्रकार हमारी आप की तरह मनुष्य हैं जिनकी अपनी भावनायें अपने दुःख सुख होते हैं | हर परिस्थिति में वे अपना काम करते हैं कईयों की माली हालत बहुत खराब है कई बार पांच सितारा होटलों के कांफ्रेंस रूम में प्रेस कांफ्रेंस के बाद शानदार दावत दी जाती है लेकिन घर में अपना परिवार विपिन्नावस्था में जीवन बिता रहा है उनके गले से निवाला नहीं जाता फिर भी वह अपना दुःख व आर्थिक स्थिति का किसी से जिक्र नहीं करते कुछ नया करने की धुन में लगे रहते हैं |
चेनल अपनी टीआरपी बढाने के लिए अनेक यत्न करते हैं | उन समाचारों को प्रमुखता देते हैं जिनकों श्रोताओं को सुनाने के लिए चटपटा बनाने के लिए अनेक किस्से जोड़े जाते हैं विवादित व्यक्तियों को बुला कर बहस कराई जाती है जितना शोर शराबा होता है उतना ही दर्शकों की रूचि चैनलों की तरफ बढती है टीआरपी की जंग निरंतर चलती है | चैनल फेमस हो कर एड (विज्ञापन बटोरते हैं) लेकिन प्रिंट मीडिया उन समाचारों की अंदर की बात देते हैं जिनहें चैनल छिपा जाते हैं | जब तक सनसनी फैलाई जा सके तब तक समाचारों को चलाते हैं अचानक बिना किसी अंत के बंद कर देते हैं| गरमा गर्म बहसें होती हैं लेकिन बहस का रुख अपने हिसाब से मोड़ते हैं | मजमा जोड़ा जाता है कई बार बहसों में दर्शकों को भी शामिल किया जाता है उन्हें अपनी बात कहने का अवसर दिया जाता है लेकिन बागडोर अपने हाथ में रखी जाती है बाद में प्रोडक्शन डिपार्ट मेंट अपने हिसाब से काट छांट कर पेश करता है | इसके विपरीत समाचार पत्रों के सम्पादकीय जिस विषय को उठाते हैं उसका विस्तार से सही सटीक विश्लेष्ण करते हैं अंत में सुझाव के साथ निष्कर्ष भी देते हैं | समाचार पत्रों को सफल बनाने उनका खर्च निकालने के लिए के विज्ञापनों की जरूरत पडती है
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