बदला दौर

कभी फुटपाथ पर बिकने वाले अश्लील साहित्य से लेकर टीवी-वीसीआर-वीसीडी और सिनेमा के रास्ते से आज हम यू-ट्यूब तक पहुंच चुके हैं, लेकिन एक समाज के रूप में हमारी यौन-प्रवृत्तियां बद से बदतर होती गई हैं। उदाहरण के लिए: यदि हम यू-ट्यूब पर अंग्रेजी में ‘रेप सीन’ लिखकर सर्च करें तो 21 लाख परिणाम आते हैं। इसका मतलब है कि लोग आज भी फिल्मों के उस विशेष हिस्से को बार-बार देखना-दिखाना चाहते हैं जिनमें बलात्कार को फिल्माया गया होता है, और बलात्कार के ऐसे दृश्य देखकर हममें करुणा, सहानुभूति या आक्रोश की भावना पैदा नहीं होती, बल्कि ये दृश्य मनोरंजन के और तो और हमारी काल्पनिक यौन-इच्छाओं को संतुष्ट करने का साधन बनते हैं। 
आधुनिक युग में मनोवैज्ञानिकों ने भी अपने अध्ययन में पाया है कि हमारे दिमाग की बनावट इस तरह की गई है कि बार-बार पढ़े, देखे, सुने या किए जाने वाले कार्यों और बातों का असर हमारी चिंतनधारा पर होता ही है; और यह हमारे निर्णयों और कार्यों का स्वरूप भी तय करता है. इसलिए पोर्न या सिनेमा, और अन्य डिजिटल माध्यमों से परोसे जाने वाले सॉफ्ट पोर्न का असर हमारे दिमाग पर होता ही है और यह हमें यौन-हिंसा के लिए मानसिक रूप से तैयार और प्रेरित करता है। इसलिए अभिव्यक्ति या रचनात्मकता की नैसर्गिक स्वतंत्रता की आड़ में पंजाबी पॉप गानों से लेकर फिल्मी ‘आइटम सॉन्ग’ और भोजपुरी सहित तमाम भारतीय भाषाओं में परोसे जा रहे स्त्री-विरोधी, यौन-हिंसा को उकसाने वाले और महिलाओं का वस्तुकरण करने वाले गानों की वकालत करने से पहले हमें थोड़ा सोचना होगा। 
यह समानुभूति का अभाव ही तो है कि बलात्कार पीड़िता या सर्वाइवर के प्रति डॉक्टर, पुलिस, वकील और न्यायिक अधिकारियों तक का रवैया इतना संवेदनहीन होता है कि कई महिलाएं मुकदमा वापस ले लेती हैं और कई तो रिपोर्ट तक नहीं करती हैं। किशोर न्याय परिषद् (नाबालिगों के कोर्ट) से जुड़ीं एक महिला सामाजिक कार्यकर्ता ने इन लेखक को बताया था कि पिता और दादा की उम्र तक के वकील पीड़ित बच्चियों से ऐसे घृणित सवाल इतने संवेदनहीन तरीके से पूछते हैं कि ज्यादातर बच्चियों को बलात्कार से भी अधिक सदमें से कई-कई बार गुजरना पड़ता है. जबकि इस बारे में तय नियम और दिशा-निर्देश भी मौजूद हैं, लेकिन उनका पालन शायद ही भारत के किसी थाने या न्यायालय में होता होगा. इसलिए फांसी देने या नपुंसक बना देने से इसे रोकना असंभव है. त्वरित न्यायबोध और पीड़ितों की संतुष्टि के लिए ऐसे दंडात्मक प्रयास भी चलें. लेकिन यह वास्तविक समाधान नहीं होगा. जबकि समानुभूति सीखने-सिखाने और पैदा करने का रास्ता बहुत मुश्किल और लंबा जरूर है, लेकिन असंभव नहीं.
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