अकेलापन



आज विश्व में मनोरंजन के इतने साधन हो गए हैं कि लगभग प्रत्येक व्यक्ति दर्शक बन गया है क्या यह अत्यंत आश्चर्यजनक बात नहीं है?  जब कभी हमें थोड़ी सी भी फुर्सत मिलती है वैसे ही हम किसी मनोरंजन की खोज करने लगते हैं।
या तो हम कोई उपन्यास या कोई पत्रिका उठाते हैं या कुछ ही देर पहले रखें मोबाइल को फिर से उठा देते हैं  या अपने आप को कभी समाप्त ना होने वाली बहस में डुबो देते हैं।  

हम सतत यही प्रयास करते हैं ताकि हम अपने से आपसे दूर भाग सके पर कभी आपने महसूस किया  जब आप दुनिया से दूर होते है तो खुद के बेहद करीब होते हैं तब आप अपने सबसे अच्छे दोस्त होते है या यूं कहें आत्मविशलेषक बन जाते हैं।

अकेलेपन के भाव को गर हम एक ऐसे पड़ाव के रूप में देखे कि अब मुझे खुद से दोस्ती करनी होगी , खुद को कसौटी पर कसना हैं अपना आलोचक और प्रशंसक मुझे ही बनना है तो फिर ये अकेलापन आपको डरायेगा नहीं बल्कि एक गजब की ताकत एक आत्मविश्वास देगा क्योंकि व्यक्ति परिवार, प्यार, समाज से तो झूठ बोल सकता हैं मगर खुद से नहीं और खुद से ईमानदारी का अंकुर तब फुटता है जब आप अकेले होते है

क्योंकि उस पल आप खुद के साथ होते है। साथ ही करीब होते हैं उन सपनों और लक्ष्यों के जो कभी परिस्थितिवश या किसी मोह के स्वरूप या निश्चय में कमी के फलस्वरूप पूरा नहीं कर पाते। ऐसे में कभी, कहीं ऐसा मुकाम आता है जहां आप खुद को अकेला पाते है तो निराश मत होइए। बस उस अकेलेपन को गहराई से महसूस कीजिए । खुद के सपनों और केवल खुद के वजूद को ढूंढिए तो महसूस करियेगा कैसी एक आग सी जलती है आपके अन्दर खुद को पाने की, एक मुकाम दिलाने की। तब ये आग एक लौ की तरह आपके आगे अपने जीवन का लक्ष्य रख

हर बड़ी लड़ाई पहले अकेले ही लड़नी पड़ती है जब मंजिल दिखने लगती है लोग खुद ब खुद आपके साथ जुड़ने लगते है फिर आप अकेले नहीं बल्कि अकेलेपन से मिले अपनेपन को इंज़ॉय करने लगते हैं। इसी अकेलेपन के अनुभव को जीते हुए मशहूर शायर गा़लिब ने  लिखा है “मैं तो अकेला ही चला था ,मंजि़ले ग़लिब मगर लोग जुड़ते गए और कारंवा बढ़ता गया ” पर ये तभी संभव है जब आप अकेलेपन को अपना दुश्मन नहीं बल्कि अपना बेस्ट फ्रेंड मान कर चले।   


तभी रविन्द्रनाथ टैगोर ने भी लिखा है एकला चलो ………………एकला चलो……………………एकला चलो रे…………….इस अकेलेपन को उन्होंने सकारात्मक सोच के साथ जिया और जीना सिखाया हैं।
©राजेश

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