बांस की टोकरी
आज से करीब 30 साल पहले केकड़ी अजमेर से भागकर अपने बेटे को साथ जयपुर आई थी, मेरे ससुराल वालों ने मुझे घर से निकाल दिया था, मेरे हिस्से की जमीन भी हड़प ली गई । जब मैं जयपुर में अाई तब मुझे मजदूरी के अलावा कुछ नहीं आता था, कुछ महीनों दिहाड़ी मजदूरी करती रही, बाद में देखा देखा ठेकेदार बहुत बार मेरा पैसा खा जाता था या काम ना देने की धमकी देकर पैसा रोक लेता था ।
कुछ महीनों के बाद मैने मेरे साथ काम करने वाली रत्ना से रावण के पुतले बनाना सिखा और हर दशहरे को रावण के पुतले बनाना शुरू किया सालों तक यही काम करती रही, आज मेरी उम्र 55 साल है, मेरा एक बेटा है जो खुद दिहाड़ी मजदूरी करता है उसे कभी काम मिल पाता है तो कभी महीनों तक नहीं मिल पाता, उसकी दो बेटियां अभी बहुत छोटी है जो मेरे साथ ही रहती है।
मैने मेरी पूरी जिंदगी में ऐसा कठिन समय नहीं देखा था हैं खाने के लाले पड़ गए है, ना मजदूरी मिलती ना कोई और कोई काम,
इस वर्ष सरकार ने कोराना वायरस की वजह से दशहरे पर्व का आयोजन भी रोक दिया है तो रावण के पुतलों की बिक्री भी नहीं हो पाएगी इसलिए अभी तक हमने रावण के पुतले बनाना शुरु नहीं किया है ।
( कहानी के अंत में बताया कि हर वर्ष की भांति उसे इस बार भी उन्हें रावण के पुतले बनाने का मन है तो शायद इस बात वो कम से कम छोटे पुतले तो बनाएं )
अपनी भीगी आंखों को पोंछते हुए भगवती देवी ने बताया कि कोरोना वायरस की वजह से जीवन यापन करने में कितनी मुश्किलें आ रही है । हाल ही के महीनों में भगवती देवी ने बांस की टोकरियां बनाना सीखा पिछले कुछ महीनों से वो बांस की टोकरियां बना रही है, 1 दिन में दो टोकरियां बना लेती है।
सुबह-सुबह मुहाना मंडी से बांस खरीद कर लाती हैं और फिर टोकरियां बनाना शुरू करती है, एक बांस बार में दो टोकरियां बना पाती है जिसका वाजिब मूल्य भी नहीं मिल पाता फिर भी जीवन यापन करने और अपना परिवार पालने के लिए यही काम कर रही है ।
उन्होंने बताया कि बिहार से आने वाली टोकरियां सस्ती होने और प्लास्टिक की टोकरियों का ज्यादा चलन होने से उन्हें इस काम का भी उचित मूल्य नहीं मिल पाता है।
कोराना के चलते ऐसे ही बहुत परिवार है जो अपना मूल काम छोड़कर दूसरा कोई और काम करने के लिए मजबुर है पर हिम्मत नहीं हारे है । उन्हें उम्मीद है जल्द ही सब सही हो जायेगा और इस उम्मीद के सहारे ही अपना जीवन यापन कर रहे हैं।
अपनी जीवन कहानी बताने वाली भगवती देवी अब भी एक बेटे के साथ सड़क के किनारे जयपुर के इमलीवाला फाटक के पास झुग्गी में रहती है, उनकी दो पोतियां है जिन्हे वो पास के सरकारी स्कूल में भेजती है।
© राजेश
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