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प्रेम और सेक्स  ...  जब तक पुरुष के लिंग में तनाव है ,तब तक वो प्रेम नही दे सकता,अगर किसी स्त्री के पास पुरुष जाता भी है और ये कहता है कि मैं तेरे करीब इस कारण हूँ की मैं प्यार करता हूँ ,तो ये धोखा है गलत है, सेक्स शरीर की जरूरत है ,तो ये गलत नही है पर सेक्स को प्यार कहने की भूल से बचें, ईमानदार होकर रहे ।अगर सेक्स करना है तो सामने वाले को साफ शब्दों में कहे , और साथी से पहले ,खुद को स्पष्ठ कर ले कि मैं प्यार में हूँ या वासना में ! औरत  फूल की तरह कोमल होती है और फूल को रगड़कर ,नोचकर ,उसके शरीर पर निशान बनाकर या बाहर भीतर घिसकर ,प्यार नही किया जाता । स्त्री का शरीर और उसकी योनि की नसें ,बेहद संवेदनशील होती है । बहुत ज्यादा बारीक होती है । आज जो महिलाए ,अपनी डॉक्टर के पास जा रही है ,उसका एक कारण ये भी है कि उनके शारीरिक सम्बन्धो में हिंसा है । वासना के वेग के चलते ,न तो पुरुष को होश रहता और न स्त्री इतनी हिम्मत कर पाती की पुरुष को( न) कह सके । और फिर बच्चादानी में हजारो बीमारी लग जाती है ।महावारी में भयानक दर्द ,ocd ,pocd और पता नही क्या क्या ,सहन करना पड़ता है । पुरुष एक्टि...

jaipur foundation Day 2020

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Jaipur. World Heritage Jaipur city is celebrating its 293rd Foundation Day today. Heritage, Heritage’s unique artwork Although the city of Jaipur was founded by Maharaja Sawai Jai Singh II on November 18, 1727, our ‘Zapper’ is the first city in the world to be conceived around 150 years before the settlement. However, even after the settlement, the city kept turning and Zapper became the metro city today. Meanwhile, Jaipur also received World Heritage status. The work of smart city is also starting to hit the ground. The name of the city of Jaipur also changed over time. Zapper … was the first name here, which later changed to Jaipur according to English minings. The story of changing Jaipur … Jaipur was founded on 1727. -Tenched tehshed in city markets in 1872. Sawai Ramsingh made the city pink in 1875. The city before it was painted white. Actually in the year 1876 Prince of Wales (Edvd VII) came to Jaipur, so it was painted pink. Jaipur was modernized in 1942...

बांस की टोकरी

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आज से करीब 30 साल पहले केकड़ी अजमेर से भागकर अपने बेटे को साथ जयपुर आई थी, मेरे ससुराल वालों ने मुझे घर से निकाल दिया था, मेरे हिस्से की जमीन भी हड़प ली गई । जब मैं जयपुर में अाई तब मुझे मजदूरी के अलावा कुछ नहीं आता था,  कुछ महीनों दिहाड़ी मजदूरी करती रही, बाद में देखा देखा ठेकेदार बहुत बार मेरा पैसा खा जाता था या काम ना देने की धमकी देकर पैसा रोक लेता था ।  कुछ महीनों के बाद मैने मेरे साथ काम करने वाली रत्ना से रावण के पुतले बनाना सिखा और हर दशहरे को रावण के पुतले  बनाना शुरू किया सालों तक यही काम करती रही, आज मेरी उम्र 55 साल है, मेरा एक बेटा है जो खुद दिहाड़ी मजदूरी करता है उसे कभी काम मिल पाता है तो कभी महीनों तक नहीं मिल पाता, उसकी दो बेटियां अभी बहुत छोटी है जो मेरे साथ ही रहती है।  मैने मेरी पूरी जिंदगी में ऐसा कठिन समय नहीं देखा था हैं खाने के लाले पड़ गए है, ना मजदूरी मिलती ना कोई और कोई काम, इस वर्ष सरकार ने कोराना वायरस की वजह से दशहरे पर्व का आयोजन भी रोक दिया है तो रावण के पुतलों की बिक्री भी नहीं हो पाएगी इसलिए अभी तक हमने रावण के पुतले बनान...

अकेलापन

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आज विश्व में मनोरंजन के इतने साधन हो गए हैं कि लगभग प्रत्येक व्यक्ति दर्शक बन गया है क्या यह अत्यंत आश्चर्यजनक बात नहीं है?  जब कभी हमें थोड़ी सी भी फुर्सत मिलती है वैसे ही हम किसी मनोरंजन की खोज करने लगते हैं। या तो हम कोई उपन्यास या कोई पत्रिका उठाते हैं या कुछ ही देर पहले रखें मोबाइल को फिर से उठा देते हैं  या अपने आप को कभी समाप्त ना होने वाली बहस में डुबो देते हैं।   हम सतत यही प्रयास करते हैं ताकि हम अपने से आपसे दूर भाग सके पर कभी आपने महसूस किया  जब आप दुनिया से दूर होते है तो खुद के बेहद करीब होते हैं तब आप अपने सबसे अच्छे दोस्त होते है या यूं कहें आत्मविशलेषक बन जाते हैं। अकेलेपन के भाव को गर हम एक ऐसे पड़ाव के रूप में देखे कि अब मुझे खुद से दोस्ती करनी होगी , खुद को कसौटी पर कसना हैं अपना आलोचक और प्रशंसक मुझे ही बनना है तो फिर ये अकेलापन आपको डरायेगा नहीं बल्कि एक गजब की ताकत एक आत्मविश्वास देगा क्योंकि व्यक्ति परिवार, प्यार, समाज से तो झूठ बोल सकता हैं मगर खुद से नहीं और खुद से ईमानदारी का अंकुर तब फुटता है जब आप अकेले होते है क्योंकि उस पल आप खुद क...

क्या है अवसाद ?

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दुनिया भर में लगभग 35 करोड़ लोग अवसाद ग्रस्त रहते हैं. ये विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के आँकड़े हैं और इनके मुताबिक़ अवसाद की बीमारी से ग्रस्त तीन-चौथाई से अधिक लोग विकासशाल देशों में रहते हैं. विशेषज्ञ कहते हैं कि अवसाद की सबसे खराब स्थिति में पीड़ित आत्महत्या तक कर सकता है. लगभग 10 लाख लोग हर साल आत्महत्या करते हैं और उनमें से एक बड़े अनुपात में लोग अवसाद से पीड़ित होते हैं. भारत में भी करीब पांच करोड़ लोग इससे पीड़ित माने जाते हैं. अवसाद के तीन लक्षण:- 1. मूड यानी मिज़ाज. सामान्य उदासी इसमें नहीं आती लेकिन किसी भी काम या चीज़ में मन न लगना, कोई रुचि न होना, किसी बात से कोई खुशी न होनी, यहां तक गम का भी अहसास न होना अवसाद का लक्ष्ण है. 2. विचार यानी हर समय नकारात्मक सोच होना 3. शारीरिक जैसे नींद न आना या बहुत नींद आना. रात को दो-तीन बजे नींद का खुलना और अगर यह दो सप्ताह से अधिक चले तो अवसाद की निशानी है. बचाव:- 1. नींद को नियमित रखना 2. अच्छा खाना और समय पर खाना 3. तनाव तो सभी को होता है लेकिन ऐसा विचार रखना कि इसे कैसे कम रखना है 4. महत्वकांक्षा को उतना ही रखना जितना हासि...

भारत में इंटरनेट शिक्षा

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विश्वव्यापी लॉकडाउन के बीच तमाम देशों में ऑनलाइन कक्षाओं और इंटरनेट से पढ़ाई पर जोर है. भारत भी इससे अछूता नहीं जहां ऑनलाइन शिक्षा की जरूरत और उसके कारोबार के बीच डिजिटल साक्षरता और डिजिटल विभाजन जैसे मुद्दे सामने हैं. भारत में स्कूल कॉलेज समेत तमाम शैक्षणिक संस्थान अपने अपने शैक्षिक सत्र पूरे कर पाते, इससे पहले ही कोरोना संकट के चलते उन्हें 24 मार्च से बंद कर दिया गया. लॉकडाउन की इस अवधि में ऑनलाइन शिक्षण से सत्र पूरा करने की कोशिश की गयी. कई शिक्षण संस्थानों में कक्षाएं जारी थीं और इम्तहान लंबित थे. मिडिल और सेकेंडरी कक्षाएं ऑनलाइन कराने के लिए जूम जैसे विवादास्पद वेब प्लेटफॉर्मो का सहारा लिया गया. कहीं गूगल तो कहीं स्काइप के जरिए कक्षाएं हुईं. कहीं यूट्यूब पर ऑनलाइन सामग्री तैयार की गई तो कहीं लेक्चर और कक्षा के वीडियो तैयार कर ऑनलाइन डाले गए और व्हाट्सऐप के माध्यम से विद्यार्थियों के समूहों में भेजे गए. लेकिन अधिकांश संस्थान ऑनलाइन परीक्षा के लिए तैयार नहीं हैं. जानकार लोगों का मानना है कि आईआईटी जैसे संस्थान अंतिम वर्ष के छात्रों की परीक्षाएं ऑनलाइन करा सकते हैं. वास्त...

लॉकडाउन में पर्यावरण

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पर्यावरण की चिंता करने वाले और उसे लेकर अपने स्तर पर लगातार प्रयास करने वाले लोगों और संस्थाओं के लिए विश्व पर्यावरण दिवस ( 5 जून) लॉक डाउन के कारण स्वच्छ हुई प्रकृति को निहारते हुए आंतरिक खुशी प्रदान करने वाला है। स्वच्छ नदी, स्वच्छ हवा और वातावरण में आया यह बदलाव भाग-दौड़ भरे जीवन में हरियाली की वापसी है। जो मन को बड़ी राहत दे रही है। हालांकि इस हरियाली और राहत की एक बड़ी कीमत भी मनुष्य सभ्यता ने चुकाई है। कोरोना महामारी के चलते पूरी दुनिया में मौत का तांडव मचा हुआ है। यह एक बड़ा सच है कि मौत के तांडव के कारण यह पर्यावरण बदला है, अब इसकी कीमत से समझौता नहीं किया जाना चाहिए। अब हमें पर्यावरण को महामारी के बहाने नहीं, बल्कि अपने स्तर पर, आदतों में सुधार लाकर सरंक्षित करना जरुरी हो गया है। अब पर्यावरण को बचाने के लिए प्रदूषण पर हमेशा के लिए लॉकडाउन लगाना बेहद जरुरी हो गया है। लॉकडाउन ने अर्थव्यवस्था व सामाजिक ढांचे को तहस-नहस भले ही कर दिया हो, लेकिन सकारात्मक प्रभाव यह हुआ कि हवा, पानी का यह बदलाव किसी चमत्कार और बड़े लाभ से कम नहीं है। वैश्विक आंकड़े बता रहे हैं कि पिछले स...